दूर से देखो तो लगता है जैसे स्विट्ज़रलैंड का कोई भव्य रिसॉर्ट या कम से कम कोई फाइव-स्टार होटल तो होगा ही, जहाँ कदम रखते ही साक्षात ज्ञान के देवता आपका स्वागत करेंगे। मुख्य द्वार पर लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर मुस्कुराते हुए छात्र-छात्राओं की तस्वीरें देखकर ऐसा भ्रम होता है कि इस कैंपस के भीतर पैर रखते ही इंसान का सीधा नासा में सिलेक्शन हो जाएगा। लेकिन जैसे ही आप इस मायावी दुनिया के भीतर कदम रखते हैं और इसकी परतों को उधेड़ना शुरू करते हैं, तब समझ आता है कि 'ऊंची दुकान और फीके पकवान' जैसी शाश्वत कहावतें आखिर किन महान दूरदर्शियों ने और क्यों लिखी थीं। आज के दौर के इन चमचमाते प्राइवेट कॉलेजों की असलियत किसी डरावनी फिल्म की उस स्क्रिप्ट जैसी है, जहाँ बाहर तो रोशनी की चकाचौंध होती है, लेकिन अंदर पैर रखते ही एक अलग ही सामंतवादी और खोखला तंत्र आपका स्वागत करता है।
इस अनोखे साम्राज्य की सबसे बड़ी रीढ़ इसके शिक्षक या इसकी पढ़ाई नहीं, बल्कि एक बेहद खास प्रजाति है जिसे दुनिया 'संचालकों के परम चमचे' के नाम से जानती है। इन कॉलेजों का अपना एक अलग ही इकोसिस्टम होता है, जहाँ ज्ञान, योग्यता, रिसर्च पेपर या नेट-सेट जैसी डिग्रियों की उतनी ही औकात होती है, जितनी किसी गोलगप्पे की दुकान पर सूखी पपड़ी की होती है। इस पूरे सिस्टम को चलाने वाले ये चमचे बौद्धिक स्तर के मामले में इतने दयनीय होते हैं कि अगर इन्हें किसी प्राइमरी स्कूल की क्लास का मॉनिटर भी बना दिया जाए, तो वहाँ भी गृहयुद्ध छिड़ जाए। लेकिन मैनेजमेंट की जी-हुज़ूरी करने और मालिकों के सामने पूँछ हिलाने में इन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी से भी ऊंची महारत हासिल कर रखी होती है। इनका एकमात्र मूलमंत्र होता है कि जो मालिक को अच्छा लगे, वही इस ब्रह्मांड का परम सत्य है। ये लोग दिन भर गले में आईडी कार्ड लटकाकर गलियारों में इस तरह घूमते हैं जैसे कॉलेज के असली कर्ताधर्ता और चाणक्य यही हों। इनका काम क्लास में जाकर पढ़ाना या व्यवस्था को सुधारना बिल्कुल नहीं होता, बल्कि इनका मुख्य काम यह जासूसी करना होता है कि कौन सा प्रोफेसर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहा है, ताकि उसकी शिकायत सीधे मालिक के कानों तक पहुंचाई जा सके। अगर आज साक्षात आइजैक न्यूटन या अल्बर्ट आइंस्टीन भी अपनी थ्योरी लेकर इन कॉलेजों में नौकरी के लिए आ जाएं, तो ये ओवरस्मार्ट चमचे उन्हें यह कहकर बाहर का रास्ता दिखा देंगे कि सर, आपकी ग्रेविटी और रिलेटिविटी की थ्योरी तो ठीक है, लेकिन यह बताइए कि क्या आप आने वाले संडे को धूप में खड़े होकर कॉलेज के पम्पलेट बांट सकते हैं, क्योंकि अगर आप यह नहीं कर सकते तो आप हमारी संस्था के कल्चर में फिट नहीं बैठते।
जब इस अद्भुत साम्राज्य में पढ़ाई-लिखाई की बात आती है, तो स्थिति और भी मनोरंजक और भयावह हो जाती है। इन कॉलेजों के शब्दकोश में 'पढ़ाई' शब्द का वजूद सिर्फ और सिर्फ उनके रंग-बिरंगे ब्रोशर और विज्ञापनों में छपने तक ही सीमित रहता है। साल के पूरे तीन सौ दिन इन कॉलेजों के क्लासरूम में वैसा ही सन्नाटा पसरा रहता है, जैसा किसी पुरानी हॉरर फिल्म के सुनसान कब्रिस्तान में होता है। क्लास के भीतर प्रोफेसर ब्लैकबोर्ड को देखता है और ब्लैकबोर्ड प्रोफेसर को, क्योंकि छात्र तो बाहर कैंटीन में या पार्किंग में बैठकर रील्स बनाने और दुनिया बदलने की प्लानिंग में व्यस्त रहते हैं। मैनेजमेंट को भी इस सन्नाटे से कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य तो छात्रों की जेब से मोटी फीस वसूलना होता है। लेकिन असली चमत्कार और सामूहिक क्रांति तब देखने को मिलती है, जब यूनिवर्सिटी परीक्षा के दिन आते हैं। इन दिनों में इन कॉलेजों का रूप किसी परीक्षा केंद्र जैसा नहीं, बल्कि एक भव्य 'नकल महोत्सव' जैसा हो जाता है। परीक्षा हॉल में ड्यूटी पर तैनात प्रोफेसर्स को मैनेजमेंट की तरफ से सख्त और गुप्त हिदायत होती है कि छात्रों की गर्दनें भले ही एक सौ अस्सी डिग्री पर घूम जाएं, पर किसी भी कीमत पर उनका पेन नहीं रुकना चाहिए। फ्लाइंग स्क्वाड के आने की खबर मिलते ही यह पूरा चमचा तंत्र इस तरह मुस्तैद हो जाता है जैसे देश की सीमा पर कोई हाई अलर्ट जारी हो गया हो। नतीजा यह होता है कि जो छात्र साल भर कॉलेज का रास्ता भूलकर गलियों में भटकता रहा, वह मुख्य परीक्षा में सीधे पचानवे परसेंट लेकर टॉप कर जाता है। कॉलेज के संचालक अपनी पीठ थपथपाते हुए अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देते हैं कि देखिए हमारी संस्था का रिजल्ट शत-प्रतिशत रहा है, लेकिन कड़वा सच तो यह है कि ये डिग्रियां नहीं, बल्कि देश के युवाओं के लिए 'बेरोजगारी का गारंटी कार्ड' बांट रहे होते हैं। बच्चों के सुनहरे भविष्य को इस तरह से दीमक लगाया जाता है कि जब वे इस आलीशान शोरूम से बाहर निकलते हैं, तो उनके पास ज्ञान के नाम पर सिर्फ एक कोरा कागज होता है।
इस पूरे तमाशे और शोषण के खेल का सबसे लाचार, बेबस और हास्यास्पद किरदार होता है—एक प्राइवेट कॉलेज का प्रोफेसर। उसने अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन साल किताबों के बीच गुजारे होते हैं, राष्ट्रीय स्तर की कठिन परीक्षाएं पास की होती हैं, ताकि एक दिन वह देश के युवाओं का मार्गदर्शन कर सके और समाज में सम्मान पा सके। लेकिन जैसे ही वह इस प्राइवेट कॉलेज की चौखट पर कदम रखता है, उसका यह खूबसूरत भ्रम ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। यहाँ आने के बाद मैनेजमेंट उसे बहुत प्यार से समझाता है कि भाई साहब, आपका ज्ञान और आपकी डिग्रियां अपनी जगह सम्मानजनक हैं, लेकिन कॉलेज को चलाने के लिए 'एडमिशन का टारगेट' पूरा करना सबसे पहली शर्त है। इसके बाद एक प्रोफेसर की जिंदगी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के सेल्समैन से भी बदतर हो जाती है। गर्मियों की छुट्टियों में जब सरकारी कॉलेजों के शिक्षक ठंडी हवाओं का आनंद ले रहे होते हैं, तब इन प्राइवेट कॉलेजों के प्रोफेसर चिलचिलाती धूप में गली-गली, घर-घर जाकर एडमिशन की भीख मांग रहे होते हैं। पढ़ाना तो जैसे उनका एक पार्ट-टाइम जॉब बनकर रह जाता है, असली काम तो दिन भर एक्सेल शीट भरना, फर्जी अटेंडेंस रजिस्टर तैयार करना, यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर झूठे आंकड़े अपलोड करना और क्लर्क वाले सारे काम निपटाना होता है। हद तो तब हो जाती है जब कॉलेज के किसी रसूखदार डायरेक्टर या उनके किसी साले-रिश्तेदार की शादी का फंक्शन होता है, तो इन प्रोफेसर्स को मेहमानों को पानी पिलाने से लेकर पंडाल की कुर्सियां गिनने और गाड़ियों की पार्किंग संभालने जैसी वीआईपी ड्यूटियों पर लगा दिया जाता है। अगर कोई प्रोफेसर अपने आत्मसम्मान की दुहाई देने की कोशिश करे, तो मैनेजमेंट तुरंत उसे उसकी औकात याद दिलाते हुए कह देता है कि ज्ञान छोड़ो सर, पहले यह बताओ कि अगले सेमेस्टर के लिए पांच नए एडमिशन कब ला रहे हो।
कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा इन कॉलेजों का अपना अनोखा अर्थशास्त्र है, जहाँ काम तो कॉर्पोरेट के ऊंचे स्टैंडर्ड के हिसाब से लिया जाता है, लेकिन जब भुगतान की बारी आती है तो स्थिति किसी चैरिटी ट्रस्ट जैसी हो जाती है। इन कॉलेजों के मालिकों की गाड़ियां हर साल ऑडी से मर्सिडीज और मर्सिडीज से फॉर्च्यूनर में बदलती चली जाती हैं, उनके बंगले और ऊंचे होते जाते हैं, लेकिन उनके यहाँ दिन-रात खटने वाले प्रोफेसर्स की सैलरी हमेशा वेंटिलेटर पर ही आखिरी सांसें गिनती रहती है। काम लेते वक्त इन्हें इंटरनेशनल एथिक्स और संस्था के प्रति वफादारी का ऐसा पाठ पढ़ाया जाता है कि प्रोफेसर को लगने लगता है कि वह देश का सबसे महत्वपूर्ण सिपाही है, जो शिक्षा की अलख जगा रहा है। लेकिन जैसे ही महीने का अंत आता है और प्रोफेसर अपनी हक की सैलरी की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखता है, डायरेक्टर साहब का चेहरा ऐसा बन जाता है जैसे उन्होंने गलती से करेले का जूस पी लिया हो। वे बहुत ही दयनीय आवाज में कहते हैं कि इस महीने फंड जरा शॉर्ट है, यूनिवर्सिटी से पैसा फंसा हुआ है, छात्रों ने अभी तक फीस नहीं दी है, आप तो समझदार और पढ़े-लिखे हैं, कृपया अगले महीने थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए। यह रहस्यमयी 'अगला महीना' इन कॉलेजों के कैलेंडर में कभी नहीं आता। तारीखें बदलती हैं, मौसम बदल जाते हैं, साल बीत जाते हैं, लेकिन प्रोफेसर के खाते में सिर्फ उम्मीद का बैलेंस ही बचा रहता है। देश का सबसे बुद्धिजीवी वर्ग इन शिक्षा-व्यापारियों के सामने कर्ज और उधारी के साए में जीने को मजबूर रहता है और अपना ही कमाया हुआ पैसा मांगते वक्त ऐसा महसूस करता है जैसे वह कोई बहुत बड़ा अपराध कर रहा हो।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह शिक्षा के पावन मंदिर नहीं, बल्कि देश के सबसे पढ़े-लिखे दिमागों के शोषण और लाचारी की नींव पर खड़ी की गई डिग्रियां छापने वाली व्यावसायिक मिलें हैं। यहाँ छात्रों को सिर्फ एक कस्टमर समझा जाता है जिसकी जेब से पैसा निकालना है, प्रोफेसर्स को बंधुआ मजदूर माना जाता है जिनका खून चूसना है, और चापलूसी को एकमात्र ऐसी परम योग्यता माना जाता है जिसके दम पर तरक्की पाई जा सकती है। इन्होंने देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था का कबाड़खाना बना दिया है और युवा पीढ़ी के बौद्धिक विकास को इस तरह पंगु कर दिया है जिसकी भरपाई आने वाले कई दशकों तक नहीं की जा सकती।
लेकिन इस पूरे अंधेरे के बीच एक बहुत बड़ी और क्रांतिकारी उम्मीद की किरण भी छिपी हुई है, जिसका ऐलान करना आज बेहद जरूरी हो गया है। इस पूरे वृत्तांत के माध्यम से देश की शोषित जनता, लाचार प्रोफेसरों और इन अहंकारी कॉलेज संचालकों को यह बात साफ-साफ शब्दों में कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जिस दिन, हाँ ठीक उसी दिन, जब एक शिक्षक देश की राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर बैठेगा और शासन की असली पावर हाथ में आएगी, इन सभी एजुकेशन माफियाओं और शिक्षा के सौदागरों के अच्छे दिन हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे। सत्ता संभालते ही हाथों से होने वाला सबसे पहला दस्तखत इन चमचमाते कबाड़खानों की मान्यता को एक झटके में हमेशा के लिए रद्द करने वाले सरकारी आदेश पर होगा। जैसे ही पावर में आएंगे, इन कॉलेजों की इन आलीशान और घमंड से ऊंची इमारतों पर सरकारी ताला लटकाया जाएगा और इन्हें सच्चे ज्ञान के उत्कृष्ट केंद्रों में बदल दिया जाएगा। वे जितने भी मंदबुद्धि और ओवरस्मार्ट चमचे हैं जो आज प्रोफेसर्स पर धौंस जमाते हैं, उन्हें कॉलेज के मुख्य गेट पर खड़ा करके उनसे सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ 'जी-हुज़ूर, जी-हुज़ूर' कहने की कड़ी ट्रेनिंग कराई जाएगी ताकि उनके इस अनोखे टैलेंट का सही जगह इस्तेमाल हो सके। सभी योग्य प्रोफेसर्स को उनका खोया हुआ मान-सम्मान, उनका पूरा स्वाभिमान और हर महीने की पहली तारीख को उनकी पूरी सैलरी, पिछले सारे बकाए और ब्याज समेत, सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की जाएगी। और हां, जो भी संचालक सैलरी रोकने या फंड शॉर्ट होने का पुराना रोना रोने की कोशिश करेगा, उसे बिना किसी देरी के कॉलेज के सबसे बड़े ब्लैकबोर्ड को साफ करने और पूरे कैंपस की सफाई करने की विशेष वीआईपी ड्यूटी पर लगा दिया जाएगा। इसलिए हे देश के शोषित और पीड़ित प्रोफेसरों, अपने भीतर के स्वाभिमान को जिंदा रखिए, इन चापलूसों की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दीजिए, और मुस्कुराते हुए उस सुनहरे दिन का इंतजार कीजिए जब सत्ता का चाबुक हाथ में होगा और इन लुटेरों की मान्यता हवा में कपूर की तरह उड़ जाएगी।
